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स्वयं में सुधार ही परम लक्ष्य

स्वयं में सुधार ही परम लक्ष्य

स्वयं में सुधार ही परम लक्ष्य  13/02/2026 11:24:28 AM   स्वयं में सुधार ही परम लक्ष्य   Administrator

भारतीय दर्शन के अनुसार जहाँ महत्वाकांक्षा है, क्या वहाँ प्रेम रह सकता है? वह महत्वाकांक्षा भौतिक संसार में हो या मानसिक संसार में, क्या वहाँ प्रेम रह सकता है? बिल्कुल नहीं। हम मानते हैं कि वहाँ प्रेम नहीं रह सकता। फिर भी हम अपने उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहते हैं। जब हम ऐसे दांव-पेच खेलते हैं, तब हमारे मस्तिष्क पर क्या गुजरती है, जरा देखिए। मैं बड़ा महत्वाकांक्षी हूँ। आध्यात्मिकता में मेरा स्थान भगवान की बिल्कुल बगल में होना चाहिए। हो सके तो भगवान की दाहिनी ओर। मैं संबोधि प्राप्त करना चाहता हूँ। आपको पता ही है कि वह सारा छलावा है। संबोधि कोई प्राप्त करने की चीज नहीं है। जो समय के परे है, उसे आप उपलब्ध नहीं कर सकते। बाहरी विश्व में क्या चल रहा है, उस पर जरा दृष्टि डालिए। विभिन्न राष्ट्रों के बीच प्रतिद्वंद्विता है। राजनेता एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा में जुटे हैं। हम अपना सर्वनाश करने पर तुले हुए हैं। यह सब हम इसलिए चलने देते हैं, क्योंकि हम स्वयं भी भीतर प्रतिस्पर्धा में लगे हैं। भारत के इतिहास में मौर्य और गुप्तकाल को स्वर्णयुग कहा जाता है। उस युग में सम्राट चंद्रगुप्त और सम्राट अशोक जैसे व्यक्तियों ने अहिंसा को वह प्रतिष्ठा दी, जो कि साधारण व्यक्ति नहीं दे सकता। अहिंसा को प्रतिष्ठा शक्तिशाली व्यक्ति ही दे सकता है। हम इस ऐतिहासिक तथ्य को भुला देते हैं कि भारत पारस्परिक घृणा और जातीय संघर्ष से कायर बना। पारस्परिक फूट और पारस्परिक आक्रमण से कायर बना और इन्हीं कारणों से वह परतंत्र बना। कहाँ वह मौर्य युग का वृहत्तर भारत और कहाँ विक्रम की दसवीं शताब्दी के बाद का परतंत्र भारत। भारत की परतंत्रता कायरता से आई और वह कायरता सामाजिक शक्ति के विघटन से आई। भारत कुछ दशकों से भले ही कुपोषण की गिरफ्त से निकलता हुआ दिख रहा है, साथ ही अब एक नई तरह की चुनौती सामने है- बढ़ते मोटापे, डायबिटीज और अनेक गैर-संचारी (एनसीडी) रोगों की। यह शहरीकरण, शिथिल जीवनशैली और हानिकारक भोजन पर बढ़ती निर्भरता की देन है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की मानें तो भारत में 60 प्रतिशत से अधिक मौतें कार्डियोवैस्कुलर रोगों, डायबिटीज, हाइपरटेंशन और कैंसर जैसे कारणों से हो रही हैं। ये सभी कमोबेश जीवनशैली से उपजी हुई गैर-संचारी रोग हैं। पन्द्रह मिनट की अतिरिक्त नींद, दो मिनट के मध्यम गति के अतिरिक्त व्यायाम और आहार में थोड़ी सी सतर्कता से ऐसे लोग अपने जीवन में एक वर्ष और जोड़ सकते हैं, जिनकी नींद बाधित है, शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं और खानपान को लेकर लापरवाह हो चुके हैं। नींद, शारीरिक सक्रियता और आहार के बीच एक संतुलन बने, तो यह अलग-अलग परिवर्तनों के योग से अधिक हो जाता है। "यह भी साधना ही है।" यह विश्व एक अद्वितीय सत्ता द्वारा संचालित है। यह सत्ता समस्त भाव-तरंगों को नियंत्रित करती है। ईश्वर द्वारा निर्दिष्ट जीवन-पथ से कोई भी विमुख नहीं हो सकता। दर्शन, व्यवहार और साधना, सभी को इसी मूल प्रवाह के अनुरूप चलना होता है। ईश्वर को पाने के लिए आवश्यक है कि साधना के माध्यम से मन को ईश्वरमुखी बनाया जाए। मनुष्य को हमेशा यह स्मरण रखना चाहिए कि उसे यह शरीर विशेष उद्देश्य के लिए मिला है। पूर्ण और श्रेष्ठ उपयोग ही जीवन की सच्ची सार्थकता है। अतीत की गलतियों को भूलकर नए संकल्प के साथ आगे बढ़ना चाहिए। बालक हों, युवा हों या वृद्ध, अध्यात्म का मार्ग सभी के लिए समान रूप से खुला है। जब मनुष्य अपने गुण, शक्ति और संसाधन समाज को समर्पित करता है, तभी उसमें सच्चा मनुष्यत्व विकसित होता है। मनुष्यत्व के पथ पर लाने के लिए आवश्यक है कि वह स्वयं को अध्यात्म के पथ पर स्थापित करे। यही उसके जीवन का परम लक्ष्य है और यह सभी कुछ संभव है परमपूज्य महर्षि महेश योगी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान योग शैली के प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 10 से 15 मिनट के नियमित अभ्यास से क्योंकि शरीर, मन, एवं मस्तिष्क का योग ही आनंद है।

"संत मिलन को जाइये तजि ममता अभिमान।
ज्यों-ज्यों पद आगे बढ़े कोटिन्ह यज्ञ समान।।"


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